नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बीच लचीली, समावेशी और जवाबदेह आर्थिक नीतियों की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास को सामाजिक समावेशन से जोड़कर ही भारत की विकास यात्रा को व्यापक बनाया जा सकता है।
सम्मेलन का विषय ‘फ्लक्स के युग में लचीलापन’ रखा गया है। नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि नीति निर्माण जमीनी वास्तविकताओं की समझ पर आधारित होना चाहिए और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नीतियों में आवश्यक बदलाव की गुंजाइश रहनी चाहिए।
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बहस के बाद व्यापक सहमति से फैसले जरूरी
उपराष्ट्रपति ने कहा कि बदलाव के दौर में निर्णायक फैसलों के साथ व्यापक सहमति भी जरूरी है। उनके अनुसार लोकतंत्र में बहस और चर्चा महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनका उद्देश्य ऐसे निर्णयों तक पहुंचना होना चाहिए जिन्हें व्यापक स्वीकार्यता मिले।
राज्यसभा के सभापति के रूप में अपने दायित्व का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और पारदर्शी चर्चा लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करती है। उन्होंने अधिकारों और कर्तव्यों को साथ-साथ चलने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
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जनधन, जीएसटी और स्वयं सहायता समूहों का उल्लेख
सी. पी. राधाकृष्णन ने भारत के आर्थिक बदलाव में वित्तीय समावेशन और औपचारिक अर्थव्यवस्था के विस्तार को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने जेएएम ट्रिनिटी, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और जीएसटी को इस दिशा में प्रमुख माध्यमों के तौर पर गिनाया।
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उन्होंने बताया कि अगस्त 2026 तक 59 करोड़ से अधिक जनधन खाते खोले जा चुके हैं। वहीं, जीएसटी पंजीकरण 2017 में करीब 66.5 लाख से बढ़कर मई 2026 में 1.65 करोड़ हो गया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि समावेशन का मतलब केवल लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ना नहीं है, बल्कि उन्हें आय अर्जित करने, मूल्य सृजित करने और उद्यम शुरू करने में सक्षम बनाना भी है। इस संदर्भ में उन्होंने करीब 92 लाख स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 10 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाओं और 3.46 करोड़ से अधिक लखपति दीदियों का उल्लेख किया।
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उन्होंने कहा कि शिक्षा और आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भारत में महिला सशक्तिकरण से महिला नेतृत्व वाले विकास की दिशा में बदलाव को दर्शाती है।
गांवों तक विकास को पहुंचाने पर जोर
उपराष्ट्रपति ने कहा कि आर्थिक लचीलापन केवल वित्तीय बाजारों या बड़े कारोबारी संस्थानों में तैयार नहीं होता। यह उस समय भी मजबूत होता है जब किसी गांव की महिला के पास बैंक खाता हो, उसे सरकारी लाभ सीधे मिले, वह औपचारिक अर्थव्यवस्था से जुड़े और स्वयं सहायता समूह को उद्यम में बदल सके।
उन्होंने 25 करोड़ से अधिक भारतीयों के अत्यधिक गरीबी से बाहर आने का भी उल्लेख किया और कहा कि देश की विकास यात्रा में प्रत्येक राज्य, जिले और गांव को भागीदार बनाया जाना चाहिए।
शोध और संस्थागत सहयोग को बताया जरूरी
राधाकृष्णन ने मजबूत शोध और संस्थागत सहयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के बीच सहयोग का स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि भारत के बढ़ते व्यापारिक संबंधों के साथ ऐसे संस्थागत सहयोग से शोध, शिक्षा, नवाचार और उद्यमिता को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
सम्मेलन में इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (आईईजी) की भूमिका का भी उल्लेख हुआ। उपराष्ट्रपति ने कहा कि 1952 में प्रोफेसर वी. के. आर. वी. राव के नेतृत्व में स्थापना के बाद से संस्थान भारत की विकास यात्रा से जुड़ा रहा है।
समापन संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत का लचीलापन बदलाव का विरोध करने के बजाय उसे आत्मविश्वास, समावेशन और सामूहिक प्रयास के साथ अपनाने से आएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि पांचवें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में होने वाली चर्चाएं 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के प्रयासों में योगदान देंगी।
कार्यक्रम में आईईजी के अध्यक्ष और बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के सदस्य एन. के. सिंह, बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन डॉ. माइकल देबब्रता पात्रा समेत अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे।







