गांव पाली के 10 महीने के नन्हे लक्ष के पैर जन्म से मुड़े हुए थे। परिजन परेशान थे कि उनका बच्चा कभी अपने पैरों पर खड़ा हो पाएगा या नहीं। वहीं दूसरी ओर गांव जालियावास के मासूम लविश यादव के सामने जन्मजात मोतियाबिंद के कारण अंधकार का खतरा मंडरा रहा था।

लेकिन हरियाणा के रेवाड़ी जिले में केंद्र सरकार के 'राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम' (RBSK) की मोबाइल मेडिकल टीम जब इन गांवों में पहुंची, तो दोनों परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। आज लक्ष अपने सुधरे हुए पैरों से खड़ा होना सीख रहा है और लविश की दोनों आंखों में सर्जरी के बाद नई रोशनी लौट आई है और वह भी बिना एक भी रुपया खर्च किए।

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पाली के ऐसे सही हुए लक्ष के मुड़े पैर

लक्ष जब 10 महीने का था, तब 5 नवंबर 2025 को RBSK की मोबाइल स्वास्थ्य टीम गांव पाली (खंड खोल) पहुंची। नियमित जांच के दौरान डॉक्टरों की नजर मासूम के पैरों पर पड़ी। बच्चे को 'क्लब फुट' (जन्मजात पैरों का मुड़ा होना) नाम की बीमारी थी।

8 नवंबर 2025 को लक्ष को तुरंत जिला नागरिक अस्पताल रेवाड़ी लाया गया। डॉक्टरों ने सबसे पहले एक सप्ताह तक पैरों की विशेष फिजियोथेरेपी और कसरत करवाई। इसके बाद एक-एक हफ्ते के अंतराल पर 4 बार प्लास्टर चढ़ाया गया ताकि हड्डियां सही आकार में आ सकें।

27 दिसंबर 2025 को डॉक्टरों ने सुधारात्मक सर्जरी (Corrective Surgery) की। 21 दिनों की रिकवरी के बाद बच्चे को विशेष सुधारात्मक जूते (Corrective Shoes) बिल्कुल मुफ्त दिए गए।

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DEIC कम RBSK प्रबंधक मीनाक्षी यादव के अनुसार लक्ष अब अपने पैरों पर खड़ा होना और चलना सीख रहा है। बीमारी दोबारा न उभरे, इसके लिए 5 साल की उम्र तक उसकी लगातार मॉनिटरिंग की जाएगी।

मोतियाबिंद से धुंधला रही थी लविश की दुनिया

इसी तरह का एक और मामला गांव जालियावास (डाकघर सुथाना) से सामने आया। 17 जुलाई 2026 को जब मोबाइल हेल्थ टीम ने लविश यादव की जांच की, तो पता चला कि मासूम की दोनों आंखों में जन्मजात मोतियाबिंद (Congenital Cataract) है।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए उसी दिन बच्चे को रेवाड़ी के 'जिला शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र' (DEIC) लाया गया और वहां से विशेषज्ञ नेत्र चिकित्सालय रेफर किया गया।

  • 28 जुलाई 2026: लविश की दाईं आंख की सफल शल्य चिकित्सा हुई।
  • 18 अगस्त 2026: बाईं आंख का भी सफल ऑपरेशन पूरा किया गया।

निःशुल्क सर्जरी के बाद लविश की आंखों की रोशनी पूरी तरह सुरक्षित हो गई है और अब वह अपने आसपास की रंगीन दुनिया को साफ-साफ देख पा रहा है।

किस्मत का लिखा मानकर ना बैठें

अक्सर ग्रामीण इलाकों में माता-पिता बच्चों की जन्मजात कमियों को किस्मत का लिखा मानकर बैठ जाते हैं या फिर निजी अस्पतालों के महंगे इलाज के डर से डॉक्टर के पास नहीं जाते।

RBSK योजना यह साबित करती है कि अगर बच्चों में जन्मजात बीमारियां हों, तो सरकार 4D श्रेणी (Defects at birth, Diseases, Deficiencies, Development delays) के तहत आंगनवाड़ी और सरकारी स्कूलों में जाकर मुफ्त जांच और इलाज मुहैया कराती है। यदि आपके आसपास भी किसी बच्चे को चलने, देखने, सुनने या बोलने में समस्या है तो आप तुरंत नजदीकी नागरिक अस्पताल के DEIC सेंटर से संपर्क कर सकते हैं।

स्वास्थ्य विभाग रेवाड़ी की योजना जिले के सभी आंगनवाड़ी केंद्रों और सरकारी/सहायता प्राप्त स्कूलों में मोबाइल हेल्थ टीमों के जरिए शत-प्रतिशत बच्चों की स्क्रीनिंग करने की है। विभाग का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि पैसे या जानकारी के अभाव में जिले का कोई भी मासूम स्थायी विकलांगता का शिकार न बने।