एक कार के लिए 5 साल का इंतज़ार, फिर कोर्ट का फैसला और आखिर में 40 हज़ार रुपये का बिल। पानीपत की मोहिनी सिंह की कहानी यही है। 2019 में हुई एक सड़क दुर्घटना के बाद उनकी वैगनआर वर्कशॉप में गई तो वापस आज अभी तक नहीं आई ओर इस दौरान कानूनी लड़ाई में उलझी रही। अब जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने आखिरकार इस मामले पर मुहर लगा दी है, लेकिन फैसला उनकी उम्मीद के उलट निकला।

घटना 10 अगस्त 2019 की है। शामली-मेरठ रोड पर सफर के दौरान अचानक एक जानवर सड़क पर आ गया। बचने की कोशिश में मोहिनी सिंह की गाड़ी अनियंत्रित होकर डिवाइडर से टकरा गई। यह वही वैगनआर थी जो उन्होंने 25 दिसंबर 2016 को करीब 4.45 लाख रुपये में खरीदी थी।

यह भी पढ़ें -यमुनानगर के खेत में मिला अधेड़ का शव, जेब में 50 हज़ार नकद, सिर पर चोट के निशान

गाड़ी को अधिकृत सर्विस सेंटर भेजा गया। वहां मरम्मत का अनुमान 4,40,093 रुपये लगाया गया जबकि गाड़ी की बीमित घोषित कीमत (IDV) सिर्फ़ 3,39,643 रुपये थी। यहीं से पेच फंसना शुरू हुआ। बीमा कंपनी ने क्लेम में अड़चनें डालनी शुरू कीं, और मोहिनी सिंह का आरोप था कि मरम्मत के दौरान गाड़ी को और नुकसान पहुंचाया गया। नतीजा ये हुआ कि 2020 में उन्होंने मारुति सुजुकी, वर्कशॉप और नेशनल इंश्योरेंस के खिलाफ उपभोक्ता अदालत में शिकायत दर्ज करा दी।

क्या मांगा था, क्या मिला फैसले से

अपनी याचिका में मोहिनी सिंह ने दो विकल्प मांगे थे जिनमें या तो उन्हें बिल्कुल नई कार दी जाए या फिर गाड़ी की पूरी कीमत यानी 4,45,204 रुपये लौटाई जाए। साथ ही पांच साल तक चली मानसिक परेशानी के लिए 2 लाख रुपये मुआवज़े का दावा भी था।

दूसरी तरफ मारुति सुजुकी ने दलील दी कि गाड़ी की वारंटी पहले ही खत्म हो चुकी थी। वर्कशॉप का कहना था कि मरम्मत का काम काफी पहले पूरा हो चुका है और बीमा कंपनी ने भुगतान भी स्वीकार कर लिया था। सिर्फ़ ग्राहक ही गाड़ी वापस ले जाने को तैयार नहीं थीं।

यह भी पढ़ें -कोविड काल का पेमेंट अटकाने पर अफसरों पर गिरेगी गाज, कैबिनेट मंत्री रणबीर गंगवा ने दिए चार्जशीट के निर्देश

डॉ. आरके डोगरा की अध्यक्षता वाली पीठ जिसमें सदस्य डॉ. रेखा चौधरी और विनीत कौशिक शामिल थे ने दोनों पक्षों के दस्तावेज़ खंगाले। आयोग के सामने ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं आया जिससे साबित होता कि गाड़ी पूरी तरह बर्बाद (टोटल लॉस) हो चुकी थी। इसी आधार पर नई कार या पूरी रकम वापसी की मांग खारिज कर दी गई।

अब आगे क्या होगा? 45 दिन की डेडलाइन क्यों?

आयोग ने आदेश दिया है कि मोहिनी सिंह 45 दिनों के भीतर 40 हज़ार रुपये का पार्किंग शुल्क चुकाकर अपनी मरम्मत की हुई कार वर्कशॉप से वापस ले जाएं। इसका सीधा मतलब है कि गाड़ी सालों से वर्कशॉप परिसर में खड़ी रहने की कीमत अब शिकायतकर्ता को ही चुकानी होगी।

यह भी पढ़ें -वडनगर से वाराणसी सेवा बाइक यात्रा का बावल में भव्य स्वागत, महापुरुषों को किया नमन

आयोग ने यह भी साफ कर दिया कि अगर तय समय में गाड़ी नहीं उठाई गई तो वर्कशॉप संचालक के पास आयोग से इजाज़त लेकर वाहन की खुली नीलामी कराने का पूरा अधिकार होगा।

कोर्ट के इस फैसले से आम कार मालिकों के लिए क्या सीख?

यह मामला उन लाखों गाड़ी मालिकों के लिए एक चेतावनी की तरह है जो बीमा क्लेम को लेकर कंपनी और वर्कशॉप के बीच फंस जाते हैं। सबसे बड़ी सीख यह है कि टोटल लॉस का दावा तभी मज़बूत माना जाता है जब उसका कोई ठोस तकनीकी सबूत मौजूद हो, सिर्फ़ मरम्मत का ज़्यादा खर्च आना काफी नहीं। दूसरी अहम बात यह भी है कि मरम्मत हो चुकी गाड़ी को वर्कशॉप में लंबे समय तक खड़ी रखना उपभोक्ता के लिए ही आर्थिक बोझ बन सकता है, भले ही विवाद बीमा कंपनी या डीलर के साथ हो

(यह स्पष्ट नहीं है कि मोहिनी सिंह अब इस आदेश के खिलाफ किसी उच्च फोरम में अपील करेंगी या नहीं — इस पर अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं है।)