रेवाड़ी न्यूज़ हिंदी: भारतीय राजनीति और मीडिया के गलियारों में अक्सर नेताओं के कद्र और उनकी पहचान को तय करने के लिए दोहरे मापदंड देखने को मिलते हैं। अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती को दलितों की नेता, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को यादवों का नेता और आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद को जाटव समाज के प्रतिनिधि के तौर पर पेश किया जाता है।

लेकिन इसी व्यवस्था में कभी ममता बनर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी या प्रशांत किशोर जैसे प्रमुख चेहरों को सिर्फ 'ब्राह्मणों का नेता' कहकर किसी एक जाति के दायरे में सीमित नहीं किया जाता। उन्हें सदैव एक व्यापक और राष्ट्रीय कद के नेता के रूप में देखा और दिखाया जाता है।

यह भी पढ़ें -PM-AJAY योजना: SC समुदायों के लिए आजीविका, शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा विस्तार

यह रणनीति या विमर्श कोई आज की उपज नहीं है। इतिहास गवाह है कि स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय के अग्रदूत और संविधान निर्माता डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर के राजनीतिक करियर को प्रभावित करने के लिए भी इसी तरह का तरीका अपनाया गया था। उन्हें राष्ट्रनेता के बजाय केवल 'महार समाज' का नेता बताकर दुष्प्रचारित करने की कोशिशें की गईं।

साल 1952 के आम चुनाव में डॉ. आंबेडकर ने बॉम्बे उत्तर सीट से चुनाव लड़ा था। उस समय उनके प्रभाव को कम करने के लिए कांग्रेस ने मोची समाज से आने वाले नारायण सदोबा कजरोलकर को उनके सामने मैदान में उतारा। उस चुनाव में डॉ. आंबेडकर को 1,23,576 वोट मिले, जबकि कजरोलकर को 1,38,137 वोट प्राप्त हुए और बाबा साहेब को 14,558 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। महाराष्ट्र में डॉ. आंबेडकर के पूरे राजनीतिक सफर के दौरान उनके खिलाफ मातंग और मोची समाज के नेताओं को प्रतिद्वंद्वी बनाकर खड़ा किया गया ताकि उन्हें सिर्फ एक महार नेता के रूप में सीमित किया जा सके।

जानकारों का मानना है कि आज के दौर में भी वही पुराना तरीका दोहराया जा रहा है। मायावती, अखिलेश यादव, चंद्रशेखर आजाद, तेजस्वी यादव और हेमंत सोरेन जैसे अन्य OBC, SC और ST वर्ग से आने वाले नेताओं की स्वीकार्यता को केवल उनकी जाति तक सीमित करने का प्रयास किया जाता है, ताकि उन्हें एक सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता बनने से रोका जा सके।

यह भी पढ़ें -भारत-फिजी रक्षा वार्ता: समुद्री सुरक्षा और सैन्य ट्रेनिंग मजबूत करने पर बड़ा फैसला