खरीफ सीज़न की फसल जब मंडियों में पहुंचनी शुरू होती है तो उसी हफ्ते अक्सर किसानों के सामने एक पुराना डर भी लौट आता है ओर वो है भाव गिरने का डर। इस बार केंद्र सरकार ने उस डर को कम करने के लिए तीन राज्यों के किसानों को एक साथ राहत दी है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में दलहन और तिलहन की खरीद को मंज़ूरी दे दी है और इसकी कुल कीमत है 5,547.99 करोड़ रुपये है।

यह मंज़ूरी 2026-27 के खरीफ विपणन सत्र के लिए दी गई है। मतलब साफ है कि जो फसल अभी खेतों से कटकर मंडियों की ओर आ रही है उसे अब न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदा जाएगा फिर चाहे बाज़ार भाव जो भी हो। कुल मिलाकर 7.06 लाख मीट्रिक टन दलहन-तिलहन इस दायरे में आएगा।

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सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश के खाते में गया है। राज्य में अरहर (तूर) और मूंग की खरीद के लिए 3,992.57 करोड़ रुपये मंज़ूर हुए हैं ओर इसमें अकेले अरहर की हिस्सेदारी 3,937.70 करोड़ रुपये (4.66 लाख टन) है जबकि मूंग के लिए 54.87 करोड़ रुपये (6,250 टन) तय किए गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि अरहर की मौजूदा MSP (₹8,450 प्रति क्विंटल) को इस आंकड़े पर लगाकर देखें तो UP की यह खरीद सीधे उसी रेट से मेल खाती है यानी पूरी रकम बाज़ार-भाव के उतार-चढ़ाव से अछूती रहकर तय दर पर ही किसानों तक पहुंचेगी।

कर्नाटक में सरकार ने तीन फसलों यानी सोयाबीन, मूंग और सूरजमुखी की खरीद को मंज़ूरी दी है जिसकी कुल कीमत 1,107 करोड़ रुपये है। इसमें 1.155 लाख टन सोयाबीन के लिए 659.27 करोड़ रुपये, 38,250 टन मूंग के लिए 335.83 करोड़ रुपये और 13,413 टन सूरजमुखी के लिए 111.90 करोड़ रुपये शामिल हैं। तेलंगाना में 448.42 करोड़ रुपये की खरीद मंज़ूर हुई है जिसमें 62,000 टन सोयाबीन (353.90 करोड़ रुपये) और 10,766 टन मूंग (94.52 करोड़ रुपये) शामिल है।

केंद्रीय कृषि, किसान कल्याण एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस फैसले को किसानों की आय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि इसका मकसद घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना भी है। सरकार की दलील सीधी है कि जितना दलहन-तिलहन देश में ही उगेगा और खरीदा जाएगा, उतनी ही कम निर्भरता विदेशी आयात पर रहेगी। खाद्य तेलों के मामले में भारत पहले से आयात पर काफी हद तक निर्भर है, ऐसे में यह कदम उसी निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने की दिशा में एक और कोशिश माना जा रहा है।

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किसानों के लिए व्यावहारिक पहलू भी कम अहम नहीं है। सरकार ने साफ किया है कि खरीद तय केंद्रों पर होगी और भुगतान सीधे किसानों के बैंक खातों में जाएगा यानी बिचौलियों की गुंजाइश को सीमित रखने की कोशिश। हालांकि खरीद केंद्रों की संख्या, शुरू होने की तारीख और नोडल एजेंसी (NAFED या राज्य एजेंसी) को लेकर अभी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है। यह स्पष्टता आने वाले दिनों में मंत्रालय की ओर से आ सकती है।

अगर मंडी भाव MSP से नीचे गिरते हैं (जैसा कि अक्सर नई फसल आने के शुरुआती हफ्तों में होता है, क्योंकि एक साथ ज़्यादा आवक से दाम दबाव में आ जाते हैं) तो किसान इन खरीद केंद्रों पर अपनी उपज बेचकर तय दर पा सकेंगे। यही Price Support Scheme (PSS) का मूल मकसद है।

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